जब सौरव गांगुली ने अपना टीशर्ट उतारकर अपना बदला लिया था नेटवेस्ट ट्रॉफी 2002 मे युवराज और कैफ की बदौलत हम जीते थे और लॉर्ड्स मे सौरव दादा...
जब सौरव गांगुली ने अपना टीशर्ट उतारकर अपना बदला लिया था
नेटवेस्ट ट्रॉफी 2002 मे युवराज और कैफ की बदौलत हम जीते थे और लॉर्ड्स मे सौरव दादा ने जर्सी उतार के अपनी पिछली हार का बदला लिया था इंग्लैंड से ।
तब टीम का मतलब ,सचिन ,सहवाग , दादा ,द्रविड़ ,लक्ष्मण युवराज ,कैफ ,जहीर ,कुंबले , हरभजन और थोड़ा बहुत अजीत अगरकर थे । फिर 2003 हुआ , हम विश्वकप के फ़ाइनल मे जा के हार गए , इसी दौरान अंडर 19 कैप्टन शिखर धवन ने पाक के खिलाफ शतक जड़ के जीत दिलाई । फिर उनही सर्दियों मे बार्डर गावस्कर ट्रॉफी हुई , एडिलेड मे हमे फॉलोऑन मिला , लगा कि हम हार जाएंगे , पर द्रविड़-लक्ष्मण की जोड़ी चिपक गयी 2001 के जैसे .... और हम जीते उन की बदौलत हमे पहली बार बार्डर गावस्कर ट्रॉफी बराबर करने का मौका मिला , इसी सिरीज़ मे स्टीव वॉ का एतिहासिक सन्यास हुआ ।
2004 हुआ पाकिस्तान मे 5 क्रिकेट मैच और 3 टेस्ट मैच की सिरीज़ ,इरफान पठान और बालाजी खूब चमके , हम जीते , सहवाग ने 309 बनाए , उसी मैच मे सचिन 194 पे थे जब द्रविड़ ने पारी घोषित की , सचिन को निराशा हुई , पर इट्स ओके रहा :) उस दौरे से तुरंत लौट के सहवाग की शादी हुई । उसके बाद पाकिस्तान टीम ,भारत आई उसमे सौरव ने धोनी को उतारा , विशाखपटनम मे उसने 183/187 रन बनाए , पर मुझे उस से कुछ खुन्नस हो गयी , ऐसा लगा जैसे सहवाग का करिजमा चुराया हो उसने , खैर उसी साल कोच जॉन राइट का कार्यकाल समाप्त हुआ और सौरव की ज़िद पर चैपल को कोच बनाया गया , और उसके बाद जो हुआ वो कालिख ही है , सौरव जैसे कैप्टन की निराशाजनक विदाई , मेरा बच्चा मन इसके लिए राहुल से चिढ़ बैठा , खूब रोयी , जाने कितनी बार भगवान से प्रार्थना की , राहुल को कोसा , उन्हे कभी माफ न करने की कसम खाई , उफ़्फ़ ... , हम सच मे कितना अपना मान बैठते हैं क्रिकेट को , मेरे लिए क्या उस दौर के हर बच्चे के लिए क्रिकेट मतलब यही कुछ खिलाड़ी थे , ओ हमारे हीरो थे ही नहीं हैं भी ..... सौरव उस समय कैप्टन बने थे जब भारत सबसे बुरे मे था , मैच फिक्सिंग और लगातार हार ।
उन्होने जुनून जगाया , आत्मविश्वास दिया , ऑस्ट्रेलिया को उसकी स्लेजिंग के बदले स्लेजिंग मारने की हिम्मत भी दी , वो टीम के कैप्टन बने जो उनके लिए लड़ भी सकते थे .... मुझे अभी की भारतीय क्रिकेट उनकी , राइट और डालमिया की ही देन लगती है ।मेरे कमरे की दीवारे सिर्फ posters से पटी हुई थी , माँ के दिवाली की सफाई मे सब उखाड़ के जला देने पे तब तक खाना नहीं खाया जब तक उन्होने नए नहीं लगवा दिये । हम सबने "अपने" उस क्रिकेट को जिया है , जब ब्रेट ली हमे बेहद पसंद था , क्लार्क का पदार्पण हुआ ही था , पोंटिंग-हेडन के क्रीज़ पे आते ही प्रार्थना शुरू हो जाती थी , ग्रीम स्मिथ जैसाकप्तान सन्यास ले रहा था , पीटरसन के खिलाफ हूटिंग होती थी , ज़िम्बाब्वे और बांग्लादेश मे रैकिंग मे नंबर 10 पे रहने की होड लगती थी । वकार युनूस को देख के टेंशन होती थी और आफरीदी को मारलगाता देख भी गुस्सा नहीं आता था , शोएब अख्तर सबसे बड़ा कु ... लग्ता था उसके बाद शेन वार्न ।
इंजमाम उल हल रन आउट ही होगा ये बच्चा बच्चा जानता था ,,,, और मैच के बाद के इंटरव्यू मे "इनशाल्लाह बॉय्ज़ विल do btr " भरी रहती थी । पूरी पाक टीम आउट होने के बाद भी नंबर 7 पे आने वाले अब्दुल रज़्ज़ाक़ से डर लगता था । फ्लिंटोफ़्फ से इसलिए प्यार था क्यूंकी वो भैया जैसा दिखता था ।ब्रायन लारा के 400 पूरे होते देख बड़ी चिढ़ आई थी क्यूंकी अब वो महान बन जाएगा । भारत के मैच मे स्टीव बकनर का अम्पायर रहना हमेशा खौफजदा कर जाता ।हरफनमौला मतलब जैक कालिस था ।
धीरे धीरे सब छूट गया ..... पर हम जैसे लोगों के लिए क्रिकेट मतलब बस वो ही दौर रह जाएगा .... बस वो ही गोल्डेन एरा ...






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